
रीढ़ की हड्डी हमारे शरीर को सहारा देने के साथ-साथ मस्तिष्क से शरीर के विभिन्न हिस्सों तक संदेश पहुंचाने वाली नसों की सुरक्षा भी करती है। रीढ़ की हड्डी के भीतर एक नलिकानुमा स्थान होता है, जिसे स्पाइनल कैनाल (Spinal Canal) कहा जाता है। जब इस नलिका या नसों के बाहर निकलने के रास्तों का आकार कम हो जाता है और नसों पर दबाव पड़ने लगता है, तो इस स्थिति को स्पाइनल स्टेनोसिस (Spinal Stenosis) कहते हैं। यह समस्या मुख्य रूप से गर्दन और कमर के हिस्से में देखने को मिलती है। शुरुआत में इसके लक्षण हल्के हो सकते हैं, लेकिन कुछ लोगों में समय के साथ दर्द, सुन्नपन, कमजोरी और चलने-फिरने में कठिनाई बढ़ सकती है। समय पर पहचान और उचित उपचार से लक्षणों को नियंत्रित करने तथा जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
स्पाइनल स्टेनोसिस के पीछे कई कारण (Spinal Stenosi Causes) हो सकते हैं। इनमें प्रमुख हैं:
1. उम्र बढ़ने के साथ रीढ़ में बदलाव: उम्र बढ़ने पर रीढ़ की हड्डियों, जोड़ों और आसपास के ऊतकों में प्राकृतिक बदलाव होने लगते हैं। हड्डियों में अतिरिक्त वृद्धि और जोड़ों में घिसाव के कारण नसों के लिए उपलब्ध जगह कम हो सकती है।
2. डिस्क का बाहर की ओर उभरना: रीढ़ की हड्डियों के बीच मौजूद डिस्क में बदलाव आने या उसके बाहर की ओर उभरने से नसों पर दबाव पड़ सकता है।
3. लिगामेंट का मोटा होना: रीढ़ को सहारा देने वाले लिगामेंट्स उम्र के साथ मोटे और कम लचीले हो सकते हैं, जिससे स्पाइनल कैनाल संकरी हो सकती है।
4. जन्मजात संकरापन: कुछ लोगों की स्पाइनल कैनाल जन्म से ही अपेक्षाकृत संकरी होती है। ऐसे लोगों में कम उम्र में भी इसके लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
5. चोट या अन्य बीमारियां: रीढ़ की हड्डी में चोट, कुछ प्रकार के गठिया, ट्यूमर या पहले हुई रीढ़ की सर्जरी से जुड़े बदलाव भी कुछ मामलों में इस समस्या का कारण बन सकते हैं।
इसके लक्षण (Spinal Stenosis Symptoms) इस बात पर निर्भर करते हैं कि रीढ़ का कौन-सा हिस्सा प्रभावित है और नसों पर कितना दबाव पड़ रहा है। प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं:
कमर में दर्द: विशेषकर लंबे समय तक खड़े रहने या चलने पर दर्द बढ़ सकता है।
पैरों में दर्द और झनझनाहट: कमर के हिस्से में नसों पर दबाव होने से दर्द, सुन्नपन या झनझनाहट पैरों तक पहुंच सकती है।
चलने में परेशानी: कुछ लोगों को थोड़ी दूर चलने के बाद पैरों में भारीपन, दर्द या कमजोरी महसूस होती है। बैठने या आगे की ओर झुकने से राहत मिल सकती है।
गर्दन और हाथों में परेशानी: गर्दन की स्पाइनल कैनाल संकरी होने पर हाथों में दर्द, झनझनाहट या कमजोरी हो सकती है।
संतुलन बिगड़ना: गर्दन में नसों या स्पाइनल कॉर्ड पर दबाव पड़ने से चलने में अस्थिरता और हाथों से बारीक काम करने में कठिनाई हो सकती है।
यह जरूरी नहीं है कि हर मरीज में सभी लक्षण दिखाई दें। कुछ लोगों में स्कैन में स्पाइनल स्टेनोसिस होने के बावजूद कोई खास लक्षण नहीं होते।

स्पाइनल स्टेनोसिस की पहचान के लिए डॉक्टर मरीज के लक्षणों, चिकित्सा इतिहास और शारीरिक जांच का मूल्यांकन करते हैं। जरूरत पड़ने पर निम्न जांचें कराई जा सकती हैं:
एमआरआई (MRI): नसों, डिस्क, लिगामेंट्स और स्पाइनल कैनाल की स्थिति समझने में मदद करती है।
एक्स-रे (X-ray): रीढ़ की हड्डियों, उनकी बनावट और गठिया से जुड़े बदलावों का आकलन करने में उपयोगी है।
सीटी स्कैन (CT Scan): हड्डियों की संरचना को विस्तार से देखने के लिए किया जा सकता है।
न्यूरोलॉजिकल जांच: मांसपेशियों की ताकत, संवेदना, रिफ्लेक्स और चलने के संतुलन का मूल्यांकन किया जाता है।
सिर्फ एमआरआई में संकरापन दिखाई देना सर्जरी की जरूरत का प्रमाण नहीं है। जांच के निष्कर्षों का मरीज के लक्षणों और शारीरिक स्थिति के साथ मिलान करना जरूरी है।
उपचार का चुनाव लक्षणों (Treatment of Spinal Stenosis) की गंभीरता, नसों पर दबाव और मरीज की समग्र स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर किया जाता है।
1. दवाओं से उपचार: डॉक्टर दर्द और सूजन को नियंत्रित करने के लिए उपयुक्त दवाएं दे सकते हैं। दवाओं का चयन मरीज की उम्र, अन्य बीमारियों और दुष्प्रभावों के जोखिम को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
2. फिजियोथेरेपी: विशेषज्ञ की देखरेख में किए जाने वाले व्यायाम मांसपेशियों को मजबूत बनाने, लचीलापन बढ़ाने और संतुलन सुधारने में सहायक हो सकते हैं। व्यायाम मरीज की स्थिति के अनुसार निर्धारित किए जाने चाहिए।
3. गतिविधियों में बदलाव: लंबे समय तक एक ही स्थिति में खड़े रहने से बचना, जरूरत के अनुसार बीच-बीच में आराम करना और सुरक्षित तरीके से शारीरिक गतिविधि जारी रखना लाभकारी हो सकता है।
4. इंजेक्शन आधारित उपचार: चुनिंदा मरीजों में डॉक्टर एपिड्यूरल इंजेक्शन पर विचार कर सकते हैं। इससे कुछ समय के लिए दर्द में राहत मिल सकती है, लेकिन यह स्पाइनल कैनाल के संकरेपन को स्थायी रूप से ठीक नहीं करता और इसका लाभ हर मरीज में समान नहीं होता।
5. सर्जरी: यदि दर्द और चलने-फिरने की परेशानी गंभीर हो, गैर-सर्जिकल उपचार से पर्याप्त राहत न मिले या नसों की कमजोरी बढ़ रही हो, तो सर्जरी की सलाह दी जा सकती है। डीकंप्रेशन सर्जरी में नसों पर दबाव कम करने के लिए आसपास के ऊतकों या हड्डी के कुछ हिस्से को हटाया जाता है। रीढ़ में अस्थिरता होने पर कुछ मरीजों में फ्यूजन सर्जरी की भी जरूरत पड़ सकती है। सर्जरी का निर्णय विशेषज्ञ द्वारा संभावित लाभ, जोखिम और मरीज की जरूरतों का आकलन करने के बाद लिया जाता है।
यदि स्पाइनल स्टेनोसिस के साथ पैरों या हाथों की कमजोरी तेजी से बढ़ रही हो, चलने में अचानक परेशानी होने लगे, पेशाब करने में कठिनाई हो, पेशाब या मल पर नियंत्रण समाप्त हो जाए अथवा जांघों के बीच और जननांगों के आसपास सुन्नपन महसूस हो, तो तत्काल आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें। ये लक्षण गंभीर नसों के दबाव का संकेत हो सकते हैं।
उम्र बढ़ने या जन्मजात बनावट के कारण होने वाले स्पाइनल स्टेनोसिस को हमेशा रोका नहीं जा सकता। हालांकि, नियमित और सुरक्षित शारीरिक गतिविधि, सही तरीके से वजन उठाना, संतुलित आहार, मांसपेशियों की मजबूती और डॉक्टर की सलाह के अनुसार व्यायाम करने से रीढ़ के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
ध्यान दें: स्पाइनल स्टेनोसिस रीढ़ की नसों के लिए उपलब्ध जगह कम होने से जुड़ी समस्या है। इसके लक्षणों को सामान्य कमर या गर्दन दर्द समझकर लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सही समय पर जांच, उचित उपचार और नियमित चिकित्सकीय निगरानी से कई मरीज सक्रिय और बेहतर जीवन जी सकते हैं।
: डॉ. मुदस्सिर अमीन,
वरिष्ठ न्यूरोसर्जन, मान मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पिटल, सिरसा