
पाइल्स, जिसे बवासीर भी कहा जाता है, गुदा या मलाशय की नसों में सूजन या गांठ बनने की स्थिति है। यह कब्ज, लंबे समय तक बैठने, गलत खानपान और जीवनशैली के कारण हो सकता है। इसके लक्षणों में दर्द, जलन, खुजली और कभी-कभी खून आना शामिल है। आयुर्वेद के अनुसार पाइल्स को अर्श कहा जाता है, जो मुख्य रूप से वात, पित्त और कफ दोषों के असंतुलन से होता है। आयुर्वेद में पथ्य-अपथ्य, औषधीय जड़ी-बूटियां, क्षार कर्म, और जीवनशैली सुधार के जरिए इसके उपचार पर जोर दिया जाता है। शर्म या डर को दूर कर खुलकर बात करने और समय पर उपचार कराने के लिए भी प्रेरित करता है। गुदा रोग शर्म का नहीं, समझ का विषय है। अक्सर शर्म या डर के कारण लोग उपचार में देरी करते हैं, जिससे रोग गंभीर हो सकता है। सही जानकारी, स्वस्थ जीवन शैली का पालन, और विशेषज्ञ से समय पर सलाह ही स्वस्थ और पीड़ा-मुक्त जीवन की कुंजी है।आंकड़ों के अनुसार, विश्व की कुल जनसंख्या के लगभग 4.5% लोगों में पाइल्स के लक्षण पाए जाते हैं, जबकि अकेले भारत में प्रतिवर्ष 10 मिलियन लोग इस समस्या से पीड़ित होते हैं।
पाइल्स व अन्य गुद रोगों के सामान्य कारण:
पाइल्स का मुख्य कारण अनियमित जीवन शैली और उससे उत्पन्न होने वाली बद्धकोष्ठता (कब्ज) है। गुदा मार्ग (Anorectal) से संबंधित बीमारियों के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं:
आहार संबंधी कारण: खाने में रेशेदार आहार (फाइबर) का कम सेवन।
शारीरिक क्रियाएं: मल त्याग के समय जोर लगाना, पुरानी कब्ज, या डिसेंट्री डायरिया का होना।
जीवन शैली: शारीरिक व्यायाम की कमी, मोटापा, और अनियमित जीवन शैली।
दबाव: इंट्रा एब्डोमिनल प्रेशर का बढ़ना, जो गर्भावस्था, पुरानी खांसी, या बहुत भारी वजन उठाने के कारण हो सकता है।
अन्य कारण: अनुवांशिकी, पोर्टल हाइपरटेंशन और हेमोरॉयडल वैन में वॉल की अनुपस्थिति।
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हर गुदा रोग पाइल्स नहीं होता: लक्षणों को समझना जरूरी है
अक्सर यह देखा जाता है कि गुदा मार्ग से संबंधित कोई भी परेशानी—जैसे दर्द, सूजन या रक्तस्राव—होने पर लोग तुरंत उसे पाइल्स मान लेते हैं। हालांकि, यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। गुदा मार्ग से जुड़ी कई अन्य बीमारियां हैं जिनके लक्षण पाइल्स से मिलते-जुलते हैं, लेकिन उनके कारण और उपचार बिल्कुल अलग होते हैं। इसलिए, यह समझना बहुत जरूरी है कि हर गुदा रोग पाइल्स नहीं होता।
1. पाइल्स (बवासीर) क्या है?
पाइल्स में गुदा के अंदर या बाहर की रक्त वाहिकाएं (veins) फूल जाती हैं। इसके मुख्य लक्षण हैं:
शौच के समय या बाद में खून आना।
गुदा के पास गांठ (मस्सा) महसूस होना।
कभी-कभी दर्द या जलन और खुजली या असुविधा।
अत्यधिक रक्तस्राव होने पर शरीर में खून की कमी (एनीमिया) आना, जिसके कारण सांस लेने में दिक्कत, कमजोरी, आलस्य और त्वचा का पीलापन जैसे लक्षण हो सकते हैं।
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2. गुदमार्ग में होने वाले अन्य रोग
परीकर्तिका (Anal Fissure): गुदा की त्वचा में होने वाली एक छोटी दरार या कट।
भगंदर (Fistula-in-Ano): गुदा और उसके आस-पास की त्वचा के बीच एक असामान्य नली (छिद्र) का बन जाना।
गुद विद्रद्दी (Perianal Abscess): गुदा के आसपास मवाद (Pus) का फोड़ा बन जाना।
गुदभ्रंश (Rectal Prolapse): मलाशय या गुदा का हिस्सा गुदा के बाहर निकल आना।
इनके अलावा, मल द्वार का कैंसर या पॉलिप्स, जेनाइटल वॉट्स, अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसी अन्य बीमारियां भी हो सकती हैं।
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उपचार और स्वस्थ जीवन शैली की कुंजी
जीवन शैली और आहार में बदलाव : अधिक पानी पीएं और भोजन में रेशेदार आहार (फाइबर) का अत्यधिक प्रयोग करें। आहार में हरी पत्तेदार सब्जियां, सलाद, मूंग की दाल, दलिया, खिचड़ी, और पतली छाछ पर्याप्त मात्रा में शामिल करें।
परहेज करें: तेज मिर्च-मसालेदार भोजन, तला हुआ भोजन, जंक फूड, और फास्टफूड का सेवन न करें। मल त्याग के समय अधिक समय तक न बैठें और जोर न लगाएं।
व्यायाम: नियमित व्यायाम करें और भुजंगासन, पवनमुक्तासन जैसे योगासनों का अभ्यास करें।
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आयुर्वेदिक औषधियां और शल्य चिकित्सा
पाइल्स के उपचार के लिए आयुर्वेद में कई प्रभावी औषधियां उपलब्ध हैं, जैसे: त्रिफला चूर्ण, पंचसकार चूर्ण, त्रिफलागुगलु, अर्शकुटाररस, अभयारिष्ट, द्राक्षासव और जात्यादि तेल। ये दवाइयां संबंधित आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श करके ही लेनी चाहिए। यदि रोग औषध से ठीक नहीं होता है, तो आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा में कई प्रकार की शल्य चिकित्सा (Surgery) भी उपलब्ध है।
क्षारसूत्र चिकित्सा में पाइल्स का इलाज:
क्षारसूत्र चिकित्सा आयुर्वेद की एक प्रभावी और सुरक्षित पद्धति है, जिसका उपयोग विशेष रूप से पाइल्स (अर्श) के उपचार में किया जाता है। यह आयुर्वेद की एक विशिष्ट शल्य चिकित्सा पद्धति है। इसमें औषधीय धागे (क्षारसूत्र) का प्रयोग किया जाता है, जिसे विशेष आयुर्वेदिक क्षार और औषधियों से तैयार किया जाता है। पाइल्स के मस्से के आधार पर क्षारसूत्र बांधा जाता है। यह धागा धीरे-धीरे मस्से की जड़ को काटता है और साथ ही उसे सुखाकर अलग कर देता है। इस प्रक्रिया में रक्तस्राव कम होता है और संक्रमण की संभावना भी न्यून रहती है। कुछ दिनों में मस्सा स्वतः गिर जाता है। क्षारसूत्र चिकित्सा में अस्पताल में लंबे समय तक भर्ती की आवश्यकता नहीं होती और रोगी शीघ्र सामान्य जीवन में लौट सकता है। यह विधि बिना अधिक रक्तस्राव के इलाज सुनिश्चित करती है।
: डॉ. लक्ष्मी सैनी
एसोसिएट प्रोफेसर शल्य तंत्र विभाग
राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय, जयपुर प्रताप नगर